Saturday, March 1, 2008

तुम भी मेरी दीवानी हो....

तुम भी मेरी दीवानी हो
तुम भी मेरी दीवानी हो

उदासीन और बेकल मैं

अंधियारे के आलिंगन में

खोज रहा था ऊजियारे को

एकाकीपन के बन्धन में

इन्द्रधनुष के रंगो के

जब तुमने दिये पंख पसार

कालिमा के इन बादलो का

किया जगमगाहट ने संहारक्षण भर के मधुर आभास को

य़ुग में परिवर्तित तुमने किया

स्नेह के जीवन बन्धन का

अनमोल भेट यह मुझको दिया

हर्ष के रथ पे हो जाता सवार

सुन कर तुम्हारी हंसी निश्छल

धन्यवाद करु मैं उन देवो का

कॄति है जिनकी यह मुख उज्जवल

ना छिपी हॄदय कि आग कही

ना छिपा प्रेम का कोमल स्वर

कह गये मौन भावनावो को

संकोचित से यह कापते अधर

संबंध हमारे मित्रता का

तुमको यही तक है स्वीकॄत

चीख चीख के कहते थे

भावशुन्य तुम्हारे नयन अश्रुपुरित

सोच के तिल तिल तड़प रहा

खोया जो मैने प्यार यहाँ

सुकूमार भावना को अपनी बन जाते देखा

भार यहाँफिर मैने जैसे मह्सूस किया

कोमल हाथों का वह स्पन्दन

एक खूशनुमा स्वप्न हो

जैसेहमारा वो प्रथम आलिंगन

तुम इतने समीप थी मेरे

सबकुछ जैसे एक कहानी हो

फिर आखिर में बस इतना सुनाकि तुम भी मेरी दीवानी हो.....

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