आदत सी हो गयी है
तेरी निगाह्बानी की आदत हो गयी है
इस परेशानी की आदत हो गयी है
कर बैठे क्यों इश्क ?क्यों तुमसे लगाया दिल?
क्यों धागे जोड़े तुमसे मन् के ? क्यों प्यार हो गया ?
लगता है अब इस नादानी की आदत हो गयी है
अक्सर सोचा करते हैं तुमको तनहा बैठे हुए
ख़्वाबों मे अक्सर दीदार किया करते हैं
साथ भी अकेलापन और तन्हाई बोलती लगती है
क्या करें अब इस वीरानी की आदत हो गयी है
तेरी निगाह्बानी की आदत हो गयी है
ग़ज़ल बन जाते हो जब भी तस्सवुर मे आते हो
गीत बनकर अक्सर लबों से छलक जाते हो
लोगों ने मेरी आशिक मिजाजी का राज़ पुछा
मैंने कहा यूँ गुनगुनाने की आदत सी हो गयी है...
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