Sunday, March 2, 2008

Wo nahi meri . . .

Wo nahi meri . . .
wo nahi meri magar usse mohabbat hai to hai..

ye agar rasmo rivazo se bagawat hai to hai..

sach ko maine sach kaha,

jab keh diya to keh diya.

ab zamane ki nazar me ye himakat hai to hai..

dost bankar dushmano sa wo satati hai mujhe,

"FIR BHI US PE MARNA APNI FITRAT HAI TO HAI"

kab kaha mene ki wo mil jaaye mujhko,

uski baahon me dum nikle itni hasrat hai to hai..

wo hai to zinda hu, meri saanso ko uski zarurat hai to hai..

Saturday, March 1, 2008

Kya ho jata hai....

kya ho jata hai..
kya ho jata hai

ulajh ke zindagi reh jaati hai

kaisey kahen tujhse har lamha

teri yaad aati hai

kisi ke jaaney ke baad

yaaden uski aati hain

kaisey kahen hum

aankhon sey neer bahati hain

lamha lamha rone sey

baat nahi badal jaati hai

tujh bin jeeney sey

Zindagi kyun katraati hai

samjhun kaisey kya ho gaya

kyun nahi zindagi ab muskurati hai

kya ho jata hai ulajh ke zindagi reh jaati hai

...............nitin..................

"मां"

मां
पहली बार खुली,

जब आंख मेरी

सबसे पहले देखी,

प्यारी सूरत तेरी

देख मुझे आंखों से

तेरी बूंदें कुछ टपकीं

हृदयविभोर हो, तेरे सीने को

मैं लपकी. नौ मास तक

अपने अन्दर, लिए साथ मुझे,

डगर - डगर पर पडे उठाने,

दर्द कई तुझेबडी राह ताकी,

बहुत तू तडपी मुझसे मिलने

देख मुझे तेरे हृदय के दीप लगे हैं जलने.

पाई खुशी, मिला तुझे तेरा जहां

पहली बार फूटा जब मेरे मुंह से मां

अचंभित हूं मैं,

तुझे कब पता चल जाता था,

मेरा कोई भी दर्द, तेरे हृदय को भेद जाता था.

प्यार है मुझसे इतना

तो आज जुदा मत कर

होगी सच में हल्की क्या,

मुझे डोली पर बिठा कर

देख मुझे तेरी आंखों से,

आज फिर बूंदे कुछ टपकी,

रोक ले मां मुझे तेरे सीने को मैं लपकी.

साल कई बीते, आज मेरी बेटी है

देख सूरत उसकी, छवि तेरी याद

आ जाती है यादें तेरी उडा ले जाती हैं वहां,

मेरी बेटी जब पुकारती है मुझे 'मां'

तुम भी मेरी दीवानी हो....

तुम भी मेरी दीवानी हो
तुम भी मेरी दीवानी हो

उदासीन और बेकल मैं

अंधियारे के आलिंगन में

खोज रहा था ऊजियारे को

एकाकीपन के बन्धन में

इन्द्रधनुष के रंगो के

जब तुमने दिये पंख पसार

कालिमा के इन बादलो का

किया जगमगाहट ने संहारक्षण भर के मधुर आभास को

य़ुग में परिवर्तित तुमने किया

स्नेह के जीवन बन्धन का

अनमोल भेट यह मुझको दिया

हर्ष के रथ पे हो जाता सवार

सुन कर तुम्हारी हंसी निश्छल

धन्यवाद करु मैं उन देवो का

कॄति है जिनकी यह मुख उज्जवल

ना छिपी हॄदय कि आग कही

ना छिपा प्रेम का कोमल स्वर

कह गये मौन भावनावो को

संकोचित से यह कापते अधर

संबंध हमारे मित्रता का

तुमको यही तक है स्वीकॄत

चीख चीख के कहते थे

भावशुन्य तुम्हारे नयन अश्रुपुरित

सोच के तिल तिल तड़प रहा

खोया जो मैने प्यार यहाँ

सुकूमार भावना को अपनी बन जाते देखा

भार यहाँफिर मैने जैसे मह्सूस किया

कोमल हाथों का वह स्पन्दन

एक खूशनुमा स्वप्न हो

जैसेहमारा वो प्रथम आलिंगन

तुम इतने समीप थी मेरे

सबकुछ जैसे एक कहानी हो

फिर आखिर में बस इतना सुनाकि तुम भी मेरी दीवानी हो.....

दुनिया के असली अजूबे..

दुनिया के असली अजूबे
हाल फिलहाल एक हुआ तमाशा,

दुनिया वालों दो ध्यान जरा सा।

विश्व में नए अजूबे चुने गए,

एस एम एस से वोटिंग किए गए।

करोड़ों का हुआ वारा - न्यारा,

देकर वास्ता इज्जत का यारा।

भोली जनता को बनाया गया,

ताज के नाम पर फंसाया गया।

मीडिया भी बेफकूफ बन गई,

वह भी ताज के पीछे पड़ गई।

जनता से सबने गुहार लगाई,

जितने चाहो वोट दो भाई।

वोट के नाम पर खूब कमाया,

भीख मांगने का नया तरीका पाया।

अरे भाई! ताज कहाँ अजूबा है ?

वहाँ तो सोई बस एक महबूबा है!

आज के युग में कितनी तरक्की है,

ट्रेनें, हवाई-जहाज, सड़क पक्की है।

राकेट, मिसाईल, कारें, सितारा होटल हैं,

खुलती दिन रात जहाँ शैंपेन बोटल हैं।

आओ दिखाता हूँ मै आपको सच्ची अजूबे,

प्रगति के दौर के ये हैं असली अजूबे।

विश्व का प्रथम अजूबा - ध्यान दें !

मुंबई की लोकल ट्रेन में सफर कर दिखला दें!

कोई माई का लाल साबित कर दे,

इससे बड़ा अजूबा दुनिया में दिखा दे।

आओ दिखाता हूँ मैं आपको सच्ची अजूबे,

प्रगति के दौर के ये हैं असली अजूबे।

दूसरा अजूबा भी हमारे देश में,

नजरें उठा कर देख लो किसी भी शहर गली में।

कचरे के डब्बों से खाना ढ़ूंढ़ता आदमी,

उसी को खा कर अपनी भूख मिटाता आदमी।

आओ दिखाता हूँ मै आपको सच्ची अजूबे,

प्रगति के दौर के ये हैं असली अजूबे।

तीसरा अजूबा - कीड़ों सा रेंगता आदमी,

स्लम, फुटपाथ, ट्रैक पर जीवन बिताता आदमी।

सड़कों पर सुबह, लोटा लेकर बैठा आदमी,

देखिए अजूबा, मजबूर कितना आदमी।

और भी कितने अजूबे हैं हमारे देश में,

एक एक कर गिनाना है न मेरे बस में

।एक एक कर गिनाना है न मेरे बस में॥

आदत हो गयी है...

आदत सी हो गयी है
तेरी निगाह्बानी की आदत हो गयी है

इस परेशानी की आदत हो गयी है

कर बैठे क्यों इश्क ?क्यों तुमसे लगाया दिल?

क्यों धागे जोड़े तुमसे मन् के ? क्यों प्यार हो गया ?

लगता है अब इस नादानी की आदत हो गयी है

अक्सर सोचा करते हैं तुमको तनहा बैठे हुए

ख़्वाबों मे अक्सर दीदार किया करते हैं

साथ भी अकेलापन और तन्हाई बोलती लगती है

क्या करें अब इस वीरानी की आदत हो गयी है

तेरी निगाह्बानी की आदत हो गयी है

ग़ज़ल बन जाते हो जब भी तस्सवुर मे आते हो

गीत बनकर अक्सर लबों से छलक जाते हो

लोगों ने मेरी आशिक मिजाजी का राज़ पुछा

मैंने कहा यूँ गुनगुनाने की आदत सी हो गयी है...

एक टूटी जिन्दगी.......

एक टूटी जिन्दगी
है आज वही गर्द मेजो कभी किसी का सपना था
टूट कर बिखरा हुआ जोवह घर कभी अपना था
उस सपने से बोझिल आँखेइस खंढर मे अब भी झाँके
शायद वो खुशी फिर मिल जाये
रेत मे दबी हँसी फिर खिल जाये
इस आँगन ने सींचा मुझको
इसीमे मै पला , बडा हुआ
इस छत से देखी दुनिया
आज वो छत नही तो क्या???
ज्ञहाँ कभी थी दीवारेंअब कुछ पत्थर है बाकी
हसती खेलती दुनिया छूटी
अब केवल वीराना बाकी है
कुछ सपने ,दीवारों मे दबी हँसी,
खिडकी से झाँकती यादें,और एक टूटी जि्न्दगी.........