एक टूटी जिन्दगी
है आज वही गर्द मेजो कभी किसी का सपना था
है आज वही गर्द मेजो कभी किसी का सपना था
टूट कर बिखरा हुआ जोवह घर कभी अपना था
उस सपने से बोझिल आँखेइस खंढर मे अब भी झाँके
शायद वो खुशी फिर मिल जाये
रेत मे दबी हँसी फिर खिल जाये
इस आँगन ने सींचा मुझको
इसीमे मै पला , बडा हुआ
इस छत से देखी दुनिया
आज वो छत नही तो क्या???
ज्ञहाँ कभी थी दीवारेंअब कुछ पत्थर है बाकी
हसती खेलती दुनिया छूटी
अब केवल वीराना बाकी है
कुछ सपने ,दीवारों मे दबी हँसी,
खिडकी से झाँकती यादें,और एक टूटी जि्न्दगी.........
No comments:
Post a Comment