Wednesday, April 25, 2007

उन्हें क्यों न हो मुहब्बत गम से?

उन्हें क्यों न हो मुहब्बत गम से?
उन्हें क्यों न हो मुहब्बत गम से,
गम ने उन्हें रुतबा ये दिलाया है।
जिनकी शायरी पे फिदा है ज़माना सारा,
उन्हें शायर इसी गम ने बनाया है।
नज़्म लिखने की कला,वो जानते ही नहीं थ॓,
ददॆ देता है खुशी,
मानते ही नहीं थे।
वो खुशनसीब हैं,
जो गम ने उनके,
आँसुओं को नज़्म आज बनाया है।
जिनकी शायरी पे फिदा.........
गम से नफरत तो वो भी किया करते थे,
ददॆ आँखों में छिपाकर,
ताउमॄ जिया करते थे।
झलकें हैं लब्ज़ों से जब ददॆ के नगमें,
तो भरी महफिल में शायर ने शोहरत को पाया है।
जिनकी शायरी पे फिदा.........

2 comments:

Anonymous said...

very nice
i think this is the best blog

परमजीत सिहँ बाली said...

अच्छी गजल है।

उन्हें क्यों न हो मुहब्बत गम से,
गम ने उन्हें रुतबा ये दिलाया है।
जिनकी शायरी पे फिदा है ज़माना सारा,
उन्हें शायर इसी गम ने बनाया है।